भारत के ऐतिहासिक सम्पन्नता का वर्णन : इन वस्तुओं का निर्माता कौन था  ??


- जब ब्राम्हण मात्र पूजा पाठ और शिक्षक था।
- क्षत्रिय योद्धा था ; राजसत्ता का मालिक
- वैश्य व्यापार करता था
और
- शुद्र डॉ आंबेडकर के अनुसार menial job / घृणित काम करने को बाध्य था।
India in the fifteenth century .
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being a collection of
"Narratives of Voyages of India"
By
R. H. Major Esq., F.S.A.
से उद्धृत

"Introduction page v
50 AD में egypt रोमन साम्राज्य का हिस्सा हो चूका था , जोकि रोम के लिए भौगोलिक और व्यावसायिक दृस्टि से बहुत महत्व्पूर्ण था ।यह रास्ता भारतीय समुद्र से जोड़ने का रास्ता / highway था , जोकि पश्चिम के विलासी और महंगी बस्तुये जिनको सुदूर पूर्व से प्राप्त करना संभव था ; जो इनके विजय के कारन (egypt पर विजय) पैदा हुई ख़ुशी और गौरव (grandeur) की भूंख को शांति करने के लिए आवश्यक था।
Erythrean sea के Periplus ( जो समभवतः Arrian था  जिनके हम दक्कन के खूबसूरत और सटीक वर्णन के आभारी हैं ) , का लेखक बताता है किHippalus,जो कि भारतीयों से व्यापर करने वाली नावों का कमांडर था; किस तरह अरब की खाड़ी में फंस जाता है ; जो अपने पूर्व में अनुभव के आधार पर कुछ प्रयोगों को आजमाता है और उन्ही प्रयासों से दक्षिण पश्चिमी मानसून के कारण मारी- सस  पहुँच जाता है ।
   Pliny ने भी इसका विवरण दिया है । वह कहता है ---- इस बात को नोटिस में लिया जाना चाहिए कि चूँकि भारत हर वर्ष हमारे ' 550 मिलियन Sesterces (रोमन सिक्के हमारे यहाँ से ले लेता है और उसके बदले वो जो वस्तुएं (Wares) हमको देता है , वो उनकी प्राइम मूल्य की 100 गुना दाम पर बेंची जाती हैं ' ।जिस धनराशि का वर्णन किया गया है उसकी गणना हमारे धन का 1,400,000 (14 लाख ) डॉलर है।
पेज - v और vi

उस समय जो सामान (भारत से) आयात होता था उसमे महन्गे स्टोन्स और Pearls , मसाले और सिल्क थे । इतिहास हमे बताता है कि जिन pearls और diamonds की रोमन में बहुतायत से मांग थी ,उनकी सप्लाई मुख्यतः भारत से होती थी ।
Frankincense ,Cassia ,Cinnamon जैसे मुख्य मसाले पूजा के लिए नहीं बल्कि मुर्दों को जलाने में किया जाता था ; और सिल्क जिसका एक मात्र निर्यातक भारत हुवा करता था , रोम की धनी महिलाओं की पहली पसंद थी ; और तीसरी शताब्दी के उत्तरार्ध में Aurelian के समय में (सिल्क ) इसका मूल्य सोने में आँका जाता था (was valued at its weight in gold ) ।

नॉट - अब मैं महान फलित चिंतको से पूंछना चाहता हु कि भारत के चार ऊपर वर्णित वर्णों में से कौन वर्ण इसका मैन्युफैक्चरिंग करता था ?
और अगर मैन्युफैक्चरर है तो वो दरिद्र तो नहीं रहा होगा ?
और निर्माण से निर्यात तक के में किस वर्ण के लोग शामिल थे।
क्योंकि 3000 साल तक की बात दलितों के दलितापे की बात करते हैं ; तो क्या ये दलित चिंतकों के पास मेरे प्रश्न का उत्तर है ??
पेज - viii

अब भारत में  मध्यकालीन स्पेनिश यात्री बेंजामिन टुडेला के एक शूक्ष्म निरीक्षण को यहां प्रस्तुत कर रहा हूँ।

साथ में आदिकवि वाल्मीकि के अयोध्या के निरीक्षण को प्रस्तुत कर रहा हूँ।

जब तक मलेक्ष इस देश के नीति नियंता नही बने थे, देखिए दोनों में कितनी साम्यता थी ।

साथ में वाल्मीकि जी का चारों वर्णों के बारे में प्रस्तुत निरीक्षण को भी देखिए।

"इस साम्राज्य में इतनी विशाल जनसंख्या निवास करती है कि इसकी विस्तृत व्याख्या किये बगैर इसके बारे में बताना असंभव है। राजा के महल में अनेक कोठरियां हैं जो धन दौलत से भरी पड़ी हैं।
इस देश के सभी निवासी ( All inhabitants of this country) , चाहे वो ऊचें राजपद पर हों या नीचे राजपद पर हों , या फिर बाजार के अर्टिसन ( down to the artisan of the Bazar) , सबके सब अपने कानों में  मोती या अन्य महगें पथरो से मढ़ी हुई बालियां ,  हार अगुंठिया बाजूबंद अपने कानों गले उँगलियों और भुजाओं में धारण करते हैं।
All the inhabitants of the country , both those of exalted rank and of the inferior class down to the artizans of Bazaar , wear pearls , or rings adorned with precious stones ,  in their ear , on their arms , on upper part of the hand and on the fingers."

पेज -- 130।


भारत में कुछ समुदाय थे जो मालवाहन का कार्य करते थे।
जिनको #बंजारा कहते थे। 375 साल पहले जब इसाईं समुद्री डकैत नहीं आये थे , तो ये पूरे भारत में विश्व की 25 % जीडीपी का ट्रांसपोर्ट करते थे। ट्वेर्निर ने इन बंजारों का वर्णन करते हुए लिखा कि बंजारों के चार समुदाय थे , जो अलग अलग  चावल,  दाल, millet ( बाजरा जोनहारी मक्का) और नमक का ट्रांसपोर्टेशन करते थे ।

ट्वेर्निर ने लिखा कि ये लोग अक्सर 10,000 से 12,000 बैलों की बैलगाड़ी के साथ चलते थे ।
और कभी कभी , मैं पहले निकालूँगा या तुम पहले निकलोगे , इस चक्कर में एक दूसरे के कत्ल करने के लिए उतारू हो जाते थे । आज की तिथि में #रोड_रेज।
इन बंजारों का लीडर अपने गले में मोतीयों की माला पहनता था।

जब ये लोग रोडरेज में आपस में एक दूसरे का कत्ल करने को उतारू होते थे , तो लोकल राजा इनको बुलाकर एक दूसरे से समझौता कराता था , और एक मोती का माला और एक लाख रूपये दोनों को देकर विदा करता था कि, इन सामानों की सप्लाई निर्वाध चलती रहे।

जब ईसाई लुटेरों ने भारत को आधुनिक बनाने हेतु रेलगाडी और रेल रोड का निर्माण किया तो ये हिन्दू बेरोजगार हो गए।

इन्होंने उनका हिंसात्मक विरोध किया, तो उन्होंने इनको #Criminal_Tribes_Act  बनाकर जन्मजात अपराधी घोसित किया।

1952 में UNO के दबाव में नेहरू ने इस कानून को रद्द कर उनको भी #Habbitual_Offendres_Act  के तहत डालकर उंको #denotified_Caste में तब्दील किया।
अब आते हैं #जगन्नाथ_पुरी के मंदिर पर जो आदिशंकर के द्वारा स्थापित पीठ है ।

#Regulation_iv_1809 के तहत कानून बनाकर उस मंदिर में आने जाने वालों के उप्पर एक्ट बनाकर  टैक्स वसूला और मंदिर की संपत्ति का अपहरण किया।

और वही से निकला है कि शूद्रों को मंदिरों के अंदर घुसने की मनाही है , जिसको डॉ ऍमबेडकर ने बात में उन्ही ईसाईयों के चक्कर फंसकर लंबी पुस्तक लिखी।

स्वतंत्र भारत में इसी लुटेरे कानून को आधार बनाकर भारतीय सरकारें अभी भी कानून बनाकर हिंदुओं के आराध्य के ऊपर अपना कब्जा जमाए हुए है ।

या तो ये मान लो कि गोरे समुद्री डकैतों ने आपके देश के उद्धार हेतु नियम कानून बनाये थे , या फिर इन कानूनों को ख़ारिज करो।

Surendra Solanki इसके बारे में मुझसे ज्यादा अच्छा बताएँगे।

अब ये पोस्ट इसलिए लगा रहा हूँ कि Criminal Tribes Act में चिन्हित लोगों को भारत ने UNO के दबाव में denotified Caste में डाला, लेकिन जगन्नाथ पुरी के मंदिर में  स्वतह् कब्जा किया ईसाइयो  ने उसको लूटनेके लिए , और स्वतंत्र भारत में आज भी उन मंदिरों को सरकारी सिस्टम ही नियंत्रित कर रहा है , तो आवाज कब उठाओगे ?

सरकारें 68 सालो से चोरी डकैती और स्कैन  से तो खुद को विरत नहीं कर पा रहीं हैं , इनको मंदिरों में दान किए गए पैसे को कब्जाने की क्या जरूरत है ?

Narendra Modi I Support Narendra Modi Rajnath Singh

ORISSA ACT NO .11 OF 1955
SHRI JAGANNATH TEMPLE ACT, 1955
AN ACT TO PROVIDE FOR BETTER ADMINISTRATION AND
GOVERNANCE OF SHRI JAGANNATH TEMPLE AT PURI AND ITS
ENDOWMENTSORISSA ACT NO .11 OF 1955
SHRI JAGANNATH TEMPLE ACT, 1955
AN ACT TO PROVIDE FOR BETTER ADMINISTRATION AND
GOVERNANCE OF SHRI JAGANNATH TEMPLE AT PURI AND ITS
ENDOWMENTS

100  तालों को खोलती कुँजी पोस्ट
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भारत एक कृषिप्रधान देश था/ हैं, ये हमको मार्कसवादी चिन्तकों ने पढाया / इस झूठ के ढोल मे कितना बडा पोल है ??
देश को उद्योंगों की क्यों जरूरत हैं ? भारत का आर्थिक मॉडल भिन्न क्यों होना चाहिए ? अपने ही इतिहास से सीख नहीं सकते क्या हम ?
देश को उद्योंगों की क्यों जरूरत हैं ?
भारत एक कृषिप्रधान देश था/ हैं, ये हमको मार्कसवादी चिन्तकों ने पढाया / इस झूठ के ढोल मे कितना बडा पोल है ??

हमें पढाया गया कि भारत एक अध्यात्मिक और कृषि प्रधान देश था लेकिन ये नहीं बताया कि भारत विश्व कि 2000 से ज्यादा वर्षों तक विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति थी / angus Maddison और paul Bairoch अमिय कुमार बागची और Will Durant जैसे आर्थिक और सामाजिक इतिहास कारों ने भारत की जो  तस्वीर पेश की , वो चौकाने वाली है /
Will Durant ने 1930 मे एक पुस्तक लिखी Case For India। ये इलहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफ लाल बहादुर वर्मा के अनुसार दुनिया के आ तक सबसे ज्यादा पढे जाने वाले writer हैं और निर्विवाद हैं / इनको अभी तक किसी ism में फिट नहीं किया गया है / उन्ही की पुस्तक के कुछ अंश कि भारत को क्यों उद्योगों को बढ़वा देना चाहिये अपना स्वर्णिम आर्थिक युग वापसी के लिये ?? और उसका खुद का मॉडेल होना चाहिये न कि अमेरिका या यूरोप की नकल करनी चाहिये /

" जो लोग आज हिंदुओं की अवर्णनीय गरीबी और असहायता आज देख रहे हैं , उन्हें ये विस्वास ही न होगा ये भारत की धन वैभव और संपत्ति ही थी जिसने इंग्लैंड और फ्रांस के समुद्री डाकुओं (Pirates) को अपनी तरफ आकर्षित किया था। इस " धन सम्पत्ति" के बारे में Sunderland लिखता है :---
" ये धन वैभव और सम्पत्ति हिंदुओं ने विभिन्न तरह की विशाल (vast) इंडस्ट्री के द्वारा बनाया था। किसी भी सभ्य समाज को जितनी भी तरह की मैन्युफैक्चरिंग और प्रोडक्ट के बारे में पता होंगे ,- मनुष्य के मस्तिष्क और हाथ से बनने वाली हर रचना (creation) , जो कहीं भी exist करती होगी , जिसकी बहुमूल्यता या तो उसकी उपयोगिता के कारण होगी या फिर सुंदरता के कारण, - उन सब का उत्पादन भारत में प्राचीन कॉल से हो रहा है । भारत यूरोप या एशिया के किसी भी देश से बड़ा इंडस्ट्रियल और मैन्युफैक्चरिंग देश रहा है।इसके टेक्सटाइल के उत्पाद --- लूम से बनने वाले महीन (fine) उत्पाद , कॉटन , ऊन लिनेन और सिल्क --- सभ्य समाज में बहुत लोकप्रिय थे।इसी के साथ exquisite जवेल्लरी और सुन्दर आकारों में तराशे गए महंगे स्टोन्स , या फिर इसकी pottery , पोर्सलेन्स , हर तरह के उत्तम रंगीन और मनमोहक आकार के ceramics ; या फिर मेटल के महीन काम - आयरन स्टील सिल्वर और गोल्ड हों।इस देश के पास महान आर्किटेक्चर था जो सुंदरता में किसी भी देश की तुलना में उत्तम था ।इसके पास इंजीनियरिंग का महान काम था। इसके पास महान व्यापारी और बिजनेसमैन थे । बड़े बड़े बैंकर और फिनांसर थे। ये सिर्फ महानतम समुद्री जहाज बनाने वाला राष्ट्र मात्र नहीं था बल्कि दुनिया में सभ्य समझे जाने वाले सारे राष्ट्रों से व्यवसाय और व्यापार करता था । ऐसा भारत देश मिला था ब्रिटिशर्स को जब उन्होंने भारत की धरती पर कदम रखा था ।"
    ये वही धन संपत्ती थी जिसको कब्जाने का ईस्ट इंडिया कंपनी का इरादा था / पहले ही 1686 में कंपनी के डाइरेक्टर्स ने अपने इरादे को जाहिर कर दिया था --" आने वाले समय में भारत में विशाल और सुदृढ़ अंग्रेजी राज्य का आधिपत्य जमाना " / कंपनी  ने हिन्दू शाशकों से आग्रह करके मद्रास कलकत्ता  और बम्बई में व्यवसाय के केन्द्रा स्थापित किये , लेकिन उनकी अनुमति के बिना ही , उन केन्द्रों मे ( जिनको वो फॅक्टरी कहते थे ) उन केन्द्रों को गोला बारूद और सैनकों सेसुदृढ़ किया ।
deepak raj mirdha
yog teacher , Acupressure therapist and blogger
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