"एक सुन्दर वृक्ष"
("भारतीय शिक्षा व्यवस्था")
बात १९३१ में लंदन के शदम हाउस की है | सैकड़ों
लोगों से भरे इस ऐतिहासिक सभागृह में गांधी
जी ने गंभीर तथा सुदृढ़ शब्दों में कहा – "
बिना इस डर के कि मेरे आँकड़ों को कोई
सफलतापूर्वक चुनौती दे पाएगा, मैं कहता हूँ
कि भारत आज उससे अधिक अनपढ़ है जितना
वह पचास या सौ वर्ष पूर्व था, क्योंकि
अंग्रेज़ी प्रबंधकों ने यहाँ आने पर व्यवस्थाओं
का उनके वर्तमान रूप में उपयोग करने के बजाय
उन्हें जड़ से उखाड़ना शुरू कर दिया | उन्होंने
मिट्टी को कुरेदा, जड़ों को देखना चाहा और
उन्हें उसी हालत में छोड़ दिया – और वह सुन्दर
वृक्ष नष्ट हो गया |" गांधी जी का संकेत था
स्वतंत्र भारत की सुन्दर वृक्ष-रूपी सशक्त और
गौरवशाली शिक्षा व्यवस्था की ओर |
गांधी जी के कथन को अभेद्य बनाते हुए श्री
धर्मपाल ने अठारहवीं शताब्दी की भारतीय
शिक्षा प्रणाली पर आधारित 'द ब्यूटीफुल
ट्री' नामक पुस्तक लिखी | धर्मपाल की
पुस्तक में स्वतंत्र भारत की शिक्षा व्यवस्थाओं
का जो विवरण है, वह आज हमारे लिए
विस्मयकारी प्रतीत होता है | ध्यान रखा
जाए कि इस पुस्तक में दिए गए अधिकतम आंकड़े
खुद अंग्रेज़ों के शोध कार्यों में से लिए गए हैं |
धर्मपाल लिखते हैं कि बंगाल के सर्वेक्षण में
पाया गया कि अकेले बंगाल और बिहार के
इलाकों में १८३० के दशक में १,००,००० विद्यालय
थे | १८२० में बॉम्बे प्रेसीडेंसी के वरिष्ठ अफसर
जी.एल.प्रेंडरगास्ट ने कहा कि " इस प्रदेश में
शायद ही ऐसा कोई गांव होगा जहाँ एक या
उससे अधिक पाठशालाएँ न हो " | मद्रास और
पंजाब के क्षेत्रों में भी कुछ ऐसे आंकड़ें देखे गए थे
| प्रचलित मान्यता के अनुसार ब्राह्मण जाति
तक ही शिक्षा का वरदान सीमित नहीं था |
मसलन मद्रास के कई विद्यालयों में ५० प्रतिशत
से भी अधिक तथाकथित शूद्र जाति के छात्र
अभ्यास-रत थे |
प्रारंभिक वर्षों में बच्चों को अक्षर-ज्ञान देने
के लिए उस अक्षर से शुरू होने वाला एक शब्द
तथा एक नैतिक-मूल्यों पर आधारित सूक्ति भी
पढ़ाई जाती थी | जैसे 'द' अक्षर के साथ थी
सूक्ति "दोष न दीजे कहुँ, दोष करम अपने का",
अर्थात, अपनी असफलताओं का कारण दूसरों
को न मानकर स्वयं के कर्मों को मानो |
जी.डब्ल्यू.लेइट्नेर अपने सर्वे पर आधारित पुस्तक
में इन सारी सूक्तियों की सूची देते हैं | इन
विद्यालयों में प्रायः वरिष्ठ विद्यार्थी
अपने अध्ययन के साथ-साथ अपने से छोटे
बालकों को भी पढ़ाते थे | ए.डी.कैम्पबेल
(कलेक्टर, बेल्लारी) लिखते हैं- "…ये प्रथा सच में
प्रशंसनीय है, और अनुकरण की पात्र है |"
इसके साथ ही भारत में उच्च-शिक्षा तथा
विशेष-शिक्षा व्यवस्था भी भली-भांति
विकसित थी | १८२० में पूना के २२२
विद्यालयों में से १०० से अधिक विद्यालय इस
वर्ग के थे | इन विद्यालयों में हिन्दू न्याय,
धर्मशास्त्र, एस्ट्रोनॉमी, व्याकरण,
एस्ट्रोलॉजी, काव्य, रसायन और मेडिसिन
आदि पढ़ा जाता था | शतरंज, नेविगेशन और
मौन (साइलेंस) आदि विषय भी इनमें
सम्मिलित थे | कलकत्ता में स्माल पॉक्स
निरोधक दवाई के अध्ययन संस्थान थे | कहीं
इन्हीं उन्नत केन्द्रों से भारत में ज़ंग-निरोधक
स्टील, उच्च कोटि का मोर्टार, जहाज़ों के
लिए वाटर-प्रूफिंग द्रव्य और बर्फ़ आदि बनाने
की अत्याधुनिक तकनीकें उत्पन्न हुई थीं |
शिक्षा का माध्यम थे सैकड़ों पुस्तक, जो कि
हिंदी, संस्कृत, पर्शियन, गुरुमुखी आदि में
लिखित थे | मसलन पंजाब क्षेत्र के पुस्तकों में
से कुछ थे विष्णु पुराण, अश्व-मेध, तुलसी
रामायण, विचार-सागर, मोक्ष-पंथ, गुरु-
विलास आदि | पुरे देश के हर विद्यालय में तीन
पुस्तक- रामायण, महाभारत और भगवद्गीता
तो पढ़ाये ही जाते थे | अतः भारत के उच्च
नैतिक और दार्शनिक ग्रन्थ बिना जाति या
पंथ के बंधन के सभी के लिए उपलब्ध थे | इसके
विपरीत यूरोप में प्रोटोस्टेंट रेवोल्यूशन के पहले
तक बाईबिल समाज के एक बहुत ही सूक्ष्म अंग
के लिए उपलब्ध थी ( साधारणतः ही इस समय
यूरोप में सार्वजनिक शिक्षा का बहुत ही
अल्प-प्रचलन था | चार्ल्स डिकेन्स जैसे
यूरोपीय लेखकों की लेखनी से पता चलता है
कि वहाँ बच्चों को सप्ताह के निश्चित
दिनों पर 'स्कूल' नामक जगहों पर भेजा जाता
था, जो कि काफ़ी अक्षम लोगों द्वारा
चलाये जाते थे और वहाँ पढ़ाने वाले ज़्यादातर
शिक्षक स्वयं निरक्षर थे | )
पर अंग्रेज़ अधिकारीयों के लिए अंग्रेज़ी न
पढ़ाने वाली शिक्षा प्रणाली ज़्यादा
लाभकारी न थी | उन्होंने अपने राजतन्त्र की
व्यवस्थाओं को चलाने के लिए भारतियों को
सक्षम बनाना चाहा | इसीलिए अब 'स्कूल',
'कॉलेज', 'डिग्री' आदि पर आधारित अंग्रेज़ी
शिक्षा प्रणाली लाई गयी | अत्यधिक करों
को भरते-भरते समाज के लोग अब देशज
विद्यालयों की आर्थिक आवश्यकताएँ पूर्ण
करने में असमर्थ हो गए | इस समय में साक्षरता
तेज़ी से घटी, और अत्यधिक देशज विद्यालय
किसी सूखते हुए पेड़ की पत्तियों
की भाँति ढह गए | देशज शिक्षा समाज के
आर्थिक और सांस्कृतिक ज़रूरतों को पूरा
करती थी | अंग्रेज़ों के अधीन उसका इन दोनों
से तलाक हो गया | एक सरकारी दस्तावेज़ में
लिखा पाया गया-"एक छात्र जो स्कूल से
गणित सीखेगा, वह शायद ही दुकान पर काम
आएगा | एक बनिया धान्य-बिक्री में अपना
गणित उससे कई ज़्यादा तेज़ी से करता है
जितना कि वह करता यदि उसने कलकत्ता
यूनिवर्सिटी से मैथमेटिक्स में ऑनर्स किया
होता !" भारतीय गुरुकुल तो समाज में मीठे
पानी के जलाशय की भाँति महत्त्वपूर्ण हुआ
करते थे| इन शिक्षा के मंदिरों के लिए अंग्रेज़ों
का 'स्कूल' शब्द बस एक अधूरा पर्यायवाची
था |
उद्देश्य यहाँ गड़े मुर्दे उखाड़ना या मात्र
अंग्रेज़ों की आलोचना करना नहीं है | और न
ही अंग्रेज़ो को दोषी और भारत को त्रुटि-
हीन सिद्ध करना है| परन्तु इस दिशा में पहल
करना कई कारणों से अत्यंत ज़रूरी है| भारत में
१९४७ में १२ प्रतिशत से २०११ में ७४ प्रतिशत तक
साक्षरता बढ़ी अवश्य है, परन्तु विश्व की
औसतन साक्षरता से यह अब भी काफ़ी कम है |
आज विश्व के सभी देशों में से निरक्षरों की
संख्या भारत में सबसे अधिक है | बदकिस्मती से
यह उसी भारत की बात है जिससे कभी बाकी
देश प्रेरणा लेते थे |
आज शिक्षा के क्षेत्र को किसी व्यवसाय के
रूप में देखा जाता है | एक ओर निरक्षरों की
संख्या अधिक है और दूसरी ओर देश में उच्च-
शिक्षित स्नातकोत्तर विद्यार्थी भी अपनी
आजीविका चलाने में असमर्थ प्रतीत होते हैं |
एक अच्छी शिक्षा प्रणाली वही है जो
छात्रों को उपयोगी ज्ञान, नैतिक मूल्य,
स्वाभिमानपूर्ण आजीविका प्रदान करे, और
उनमें देश-प्रेम की भावना जागृत करे | देश के
भूतकाल को बदला नहीं जा सकता | परंतु आज
के भारत में जहाँ बेरोज़गारी, गरीबी,
अनैतिकता और निरक्षरता जैसी अनेक
समस्याएँ खड़ी हो गयी हैं, ऐसे में देश के
भूतकाल से प्रेरणा लेना अनिवार्य हो चुका है
| शिक्षा के क्षेत्र से सम्बंधित जिन ऊंचाइयों
को छूने की तीव्र इच्छा आज हम रखते हैं, उन्हें
छूने के लिए दिशा-बोध हमें शायद विश्व में
अन्यत्र नहीं, अपने ही अतीत के पन्ने पलटकर
मिल पाएगा |
deepak raj mirdha
yog teacher , Acupressure therapist and blogger
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Reviewed by deepakrajsimple
on
October 21, 2017
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