कोई अंदाजा है कि पूरी दुनियां में अखबार की कीमत क्या होती है ? एक डॉलर या एक पौंड के लगभग की कीमत के अख़बार की कीमत को भारतीय अख़बारों की तुलना में सस्ता कहेंगे या महंगा ? पड़ोसी देश पाकिस्तान में अखबार की कीमत लगभग बीस रुपये होती है |

फिर भारत में अखबार इतना सस्ता कैसे है ? इसके पीछे कई कारण काम करते हैं | पहला कारण है सरकारी रियायतें | जिस कागज पर अखबार छपता है, यानि न्यूज़ प्रिंट, वो सरकार सस्ते दरों पर उपलब्ध करवाती है | प्रेस के लिए बिजली वगैरह की भी छूट होती है | इसका फायदा ये होता है कि आम जनता के लिए अखबार सस्ता हो जाता है | इसका नुकसान ये है कि अगर सरकार के खिलाफ लिखेंगे तो आपको कागज़ की सप्लाई अचानक बंद या कम हो जाएगी | यानी कि समर्थन में लिखो या पत्र बंद करने की नौबत आ जाएगी | ऐसा ही बिजली की सप्लाई के साथ भी होता है | दिल्ली के जिस इलाके में अखबार छपते हैं वहां की बिजली काटने का कारनामा एक परिवार विशेष कई बार कर चुका है | ये कागज़ की सप्लाई का कॉन्ट्रैक्ट कई साल का होता है, इसलिए सरकार बदलने के वक्त ये कॉन्ट्रैक्ट रिन्यू (Renew) किया जाता है | मतलब पांच राज्यों में अभी ये कॉन्ट्रैक्ट कई अखबार वाले फिर से साइन करेंगे |

दूसरी वजह होती है अख़बारों में आने वाले विज्ञापन | कई कानूनों के जरिये अख़बारों में इश्तिहार देना भारत में मजबूरी है | उस से ही अखबार की ज्यादातर आय होती है | यानि जो लोग ज्यादा इश्तिहार दे रहे हैं, उनके खिलाफ ना बोलना सीधे सीधे आर्थिक मजबूरी होती है | किसी भी अखबार का स्पेस सेल्लिंग वाला डिपार्टमेंट बड़े आराम से किसी खबर का छपना या ना छपना तय कर सकता है | ऐसा होने पर जो पत्रकार नाराज होते हैं वो स्पेस सेल्लिंग वालों की गाड़ी उठवा देते हैं | जी हां, क्राइम बीट वालों की लोकल थाने में पहचान होती है | सीधा तो स्पेस सेलिंग वाले से लड़ नहीं सकते इसलिए नो पार्किंग में लगी गाड़ी थाने भिजवा दी जाती है | बिलकुल वैसे ही जैसे स्कूल में मास्टर साहब पीट देते थे तो उनकी साइकिल-स्कूटर पंचर की जाती थी |

इसके अलावा पत्रकार पर और क्या दबाव होगा ? एक और दबाव होता है कि एक ख़ास, कहीं से आयातित विचारधारा का समर्थन | अगर आप इस आयातित विचारधारा के नहीं हैं तो जो बड़े बड़े नाम आपका इंटरव्यू लेंगे वो आपको छांट देंगे | नौकरी मिलेगी नहीं तो लिखेंगे कहाँ आप ?

इन सब की वजह से आप देखेंगे कि पिछले कई वर्षों में भारत में कोई विश्वसनीय अखबार पिछले कई सालों में शुरू ही नहीं हुआ है | जो भी अखबार आप याद करेंगे वो सब बरसों पहले से बाजार में बिकते हैं | जो नए नाम आये हैं वो भी "निष्पक्षता" के नाम पर "आयातित विचारधारा" थोपने के कारण स्थापित नहीं हो पा रहे | बाजार के उदारीकरण होने के वाबजूद कोई 10-15 अखबार नहीं उतरे हैं बाजार में | हम समाचार पत्र खरीदते तो हैं, लेकिन एक "आयातित विचारधारा" की "मोनोपॉली" वाली व्यवस्था में | यहाँ समाचारों के ग्राहक के पास विकल्प नहीं हैं |

ऐसी स्थिति में जब सोशल मीडिया का आना शुरू हुआ तो अचानक से एक बदलाव नजर आने लगा | निष्पक्षता क्या होती है ये लोगों को समझ में आने लगा | ऐसे में लोगों का भरोसा सोशल मीडिया पर तुरंत बढ़ने लगा | जो काम एक "आयातित विचारधारा" के लोग बरसों झूठ बोलने के बाद कर पाए थे वो सोशल मीडिया पर सच महीने भर में कर देता है | जाहिर है इसकी वजह से अख़बारों की मोनोपॉली को बड़ा धक्का पहुंचा है | ऐसे में इस विश्वसनीयता को तोड़ने के प्रयास भी होंगे ही |

भरोसे को तोड़ने के लिए इस "आयातित विचारधारा" के जो विदेशी फण्ड पर पल रहे बड़े दलाल हैं वो अपना एक पुराना नुस्खा इस्तेमाल करते हैं | तस्वीरों से छेड़ छाड़ करने का उनका पुराना अनुभव है | जो लोग फिल्म मीडिया में काम करते हैं वो आसानी से बता देंगे कि इस विधा में लगभग हरेक "आयातित विचारधारा" का समर्थक है | हालिया फिल्म इंस्टिट्यूट विवाद और "बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम" जैसी फिल्मों से आम लोगों को भी इसका अंदाजा हो गया होगा | आप चाहें तो अख़बारों में आने वाले फिल्म रिव्यु भी देख सकते हैं | वहां भी नजर आ जायेगा |

ये लोग अक्सर तस्वीरों के साथ वही करते हैं जिनका उन्हें बरसों का अभ्यास है | इसलिए सोशल मीडिया पर तस्वीरें शेयर करते समय दस बार सोचिये | कम से कम सुबह से शाम तक बर्दाश्त कीजिये | आपके अति-उत्साह का फायदा उठा कर वो "किराये की कलमें" आपकी विश्वसनीयता कम करने का प्रयास करती हैं | आपके दो चार साल के लिखने के अभ्यास के मुकाबले में आयातित विचारधारा का सौ साल का अनुभव है |

बाकी जयद्रथ, दुशाषण, जैसे अनुभवी योद्धाओं से सीधा अकेले लड़ जाने पर अभिमन्यु का क्या हुआ था ये तो याद ही होगा |



deepak raj mirdha
yog teacher , Acupressure therapist and blogger
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Reviewed by deepakrajsimple on October 21, 2017 Rating: 5

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