भारत में चल रही अंग्रेजी कानून व्यवस्था
अंग्रेजी कानून व्यवस्था (भाई ब्रिजेश बंसल जी के द्वारा लिपिबद्ध किया गया) १७ अगस्त २००२ का व्याख्यान
आज गम्भीर बातें नहीं हो रही हैं न समाज में न संसद में | जिनको देश को दिशा देनी चाहिये वो दिशाहीन हो गये हैं | दिशाहीन लोग समाज को दिशा नहीं दे पाते | मेरे जैसे आदमी को इस काम में लगना पड़ा ये मैं खुशी से नहीं लगा, देश की परिस्थितियाँ, देश के हालात, बढ़ते हुए अंतर्राष्ट्रीय दबाव, बढ़ती हुई गुलामी, टूटता हुआ समाज, शक्तिहीन होता हुआ समाज, बढ़ती हुई गरीबी, बेरोजगारी, ये तमाम बड़े कारण है जिन्होंने मेरे जैसे नौजवान को अन्दर से परेशान किया है | और उस परेशानी में ही मैं इस काम में लगा हूँ | मेरे सोचने का ढंग थोड़ा अलग है | किसी भी समस्या के बारे में जब विचार करता हूँ तो थोड़ा गहरे जाता हूँ उस समस्या में | उसका एक कारण ये भी हो सकता है की मैं विज्ञान और तकनीकी का विद्यार्थी रहा हूँ | तो विज्ञान का विद्यार्थी होने के नाते जब तक किसी समस्या के इतिहास को समझ नहीं लेता तब तक वो समस्या मुझे समझ नहीं आती | तो जो वर्तमान में जो समस्याएं हैं उनको भी वैसे ही समझने की कोशिश की है और इस देश की समस्याओं को समझने में मैंने लगभग २० हज़ार दस्तावेज़ इकट्ठा किये है | ये जो दस्तावेज़ मैंने इकट्ठा किये हैं ये (Indian office of britain) के हैं लन्दन के, ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स की लाइब्रेरी के हैं, दुनिया के और भी पुस्तकालय से हैं | कुछ दस्तावेज़ भारत की (archive) से निकाले हैं और उनके आधार पर मेरी जो समझ बनी वही आपको बताता हूँ |
वो सही भी हो सकती है और गलत भी तो विनम्रता से कहता हूँ की आपको कहीं गलत लगे तो आप जरूर मुझे सुधारने की कोशिश करें | ये बड़ा अभियान है , देश का काम है जिसमें मैं लगा हुआ हूँ और मुझसे गलती होगी तो सारे देश को उसका परिणाम भुगतना पड़ेगा तो ये आप की जिम्मेदारी है की मेरी गलतियों को सुधारे | देश आज़ाद हो गया है और आज़ादी के ५० साल पूरे हो गये हैं सारे देश में राजनीतिक स्तर पर जशन जैसा माहौल है हालाँकि उसकी आत्मा मरी हुई है | और माहौल इस तरह का है की हम तो आज़ाद हो गये हैं, ये देश गणतन्त्र हो गया है, और हिन्दुस्तान की संसद में भी आपने १४ अगस्त १९९७ को आपने जो कुछ हुआ वो आपने देखा ही होगा | आजादी का एक बड़ा मेला सा मनाया गया | इस देश में आजादी मनाने की भी कुछ ऐसी परम्पराएं पड़ रही हैं | जैसे उदाहरण के लिये देश में आज़ादी का जशन मनाने के लिये अमेरिका से एक संगीतज्ञ आ गया था यानी | तो हिन्दुस्तान की आज़ादी मनाने के लिये अमेरिका से संगीतकार बुलाया जाता है जो मेरी समझ के बाहर की बात है | उस यानी को हिन्दुस्तान की आज़ादी के बारे में क्या समझ है और कितनी समझ है और साथ ही साथ उस यानी को संगीत की कितनी समझ है जो मेरे देश में चलता है और बजाया जाता है | फिर एक दिन अखबार में पढ़ा की हिन्दुस्तान की आज़ादी का जशन मनाने के लिये अमेरिका की एक नाटक कम्पनी आयी उसका नाम था पॉल टेलर की कम्पनी, तो पॉल टेलर की कम्पनी हिन्दुस्तान के १०-१२ शहरों में नाटक करती थी और पॉल टेलर उस नाटक के माध्यम से दिखाने की कोशिश करते थे | लेकिन उन को मालूम नहीं था की झांसी की रानी लक्ष्मीबाई कौन थी और उस ने क्या-क्या किया | वो कोशिश करते थे हिन्दुस्तान की आजादी का इतिहास बताते थे लेकिन उसी दृष्टि से कोशिश करते थे जैसे अमेरिका वाले हिन्दुस्तान को देखते थे और दुर्भाग्य ये है हिन्दुस्तान की आजादी के जितने कार्यक्रम हो रहे हैं वो सब विदेशी कंपनियों द्वारा प्रायोजित हो रहे हैं | माने जिन विदेशी कंपनियों के कारण इस देश की आजादी चली गई थी, जिस ईस्ट इंडिया कंपनी और अंग्रेजों के कारण इस देश की आजादी चली गयी थी | अभी उन्हीं देशों की कंपनियों को हमारी देश की आजादी से इतना प्यार कैसे हो गया | टीवी पर रात दिन आप विज्ञापन देखिये तो जितने विज्ञापन हिन्दुस्तान की आज़ादी के कार्यक्रम के आते हैं वो सब विदेशी कंपनियों द्वारा प्रायोजित किये हुए होते हैं | तो ये कुछ विदुषताएं हैं, विडम्बना है इस देश की और इसी विडम्बना के बीच मेरी बात आप से करने की कोशिश कर रहा हूँ की ये जो आजादी के ५० साल पूरे हुए हैं हम कहाँ आ गये हैं और हुआ क्या है पिछले ५० साल में | पिछले ५० साल में जो कुछ इस देश में हुआ है उसको अगर ठीक से समझना हो मेरे जैसे विद्यार्थी के लिये तो मैं हिन्दुस्तान के पिछले ५०० साल को भी समझना चाहता हूँ | की पिछले ५०० साल में इस देश में क्या हुआ और पिछले ५०० साल का इतिहास अगर समझ में आ जायेगा तो अभी जो कुछ चल रहा है वो भी आपके समझ में आ जायेगा | मैं मेरी बात यहाँ से शुरू कर रहा हूँ की इस देश में कोई आजादी आयी नहीं है | ये मेरे दिल का दर्द है | इस देश में कोई आजादी आई नहीं है ये देश अभी भी उतना ही गुलाम है जितना की अंग्रेजों के ज़माने में था | और कई बार मैं इस बात को एक कदम आगे जा के कहता हूँ की ये देश अंग्रेजों के ज़माने से ज्यादा गुलाम है | देश की व्यवस्थाएं अंग्रेजों के ज़माने से ज्यादा गुलाम हैं | तो (प्लानिंग) के तीन चरण निर्धारित किए गए थे | पहला चरण ये है सबसे पहले हिन्दुस्तान की व्यवस्था को खलास किया जाए और जो बात ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स में चल रही है वो ये चल रही है की (इंडियन इकनोमिक सिस्टम) को (कोलाप्स) करा दिया जाए | और (इंडियन इकनोमिक सिस्टम) जब (कोलाप्स) हो जायेगा तो हिन्दुस्तान के व्यापारी, हिन्दुस्तान के उद्योगपति, हिन्दुस्तान के पूंजीपति, सब खलास हो जायेंगे | और ये व्यापारी, पूंजीपति, उद्योगपति अगर खलास हो जायेंगे हिन्दुस्तान में तो हमारी ईस्ट इंडिया कंपनी का माल हिन्दुस्तान के गाँव – गाँव में बिकने लगेगा और इस (डिबेट) को चलाते हुए बिलवर फ़ोर्स कह क्या रहा है एक मजेदार बात | बिलवर फ़ोर्स कह रहा है की हमको हिन्दुस्तान में फ्री ट्रेड करना है तो एक (एम् पी) पूछ रहा है उससे "वाट डू यू मीन बय फ्री ट्रेड" |तो बिलवर फ़ोर्स कह रहा है फ्री ट्रेड माने ब्रिटिश सामान का हिन्दुस्तान के गाँव – गाँव में बिकना, ब्रिटेन के माल का हिन्दुस्तान के बाज़ार में भर जाना और ब्रिटेन के माल का हिन्दुस्तानी लोगों द्वारा ज्यादा से ज्यादा उपभोग करना | ये है फ्री ट्रेड ! इसके दुसरे भाग में बिलवर फ़ोर्स इस फ्री ट्रेड की व्याख्या देते हुए एक और बात कह रहा है की ये जो फ्री ट्रेड चलेगा इसमें एक चीज़ और होनी चाहिए की हिन्दुस्तान में बहुत अच्छा कच्चा माल है जो इंग्लैंड में नहीं है जैसे कपास का कच्चा माल, स्टील का कच्चा माल, लोहे का कच्चा माल, और भी तमाम तरह का कच्चा माल | तो वो कह रहा है की कुछ इस तरह का फ्री ट्रेड चलना चाहिए की जिससे हिन्दुस्तान का कच्चा माल ब्रिटेन में आना शुरू हो जाए और उस कच्चे माल के लिए हमको एक नया पैसा खर्च करना ना पड़े और उस कच्चे माल से हम सामान बनाएं और वापस भारतीय बाज़ार में ले जाकर बचें | तो ये (डिबेट कंक्लुड़) हो रही है, (डिबेट) को (इम्प्लेमेंट) करने के लिए (पॉलिसीस) बनाई जा रही हैं और वो (पॉलिसीस) क्या बन रही हैं | पहली (पालिसी) बनी है और ईस्ट इंडिया कंपनी को (चार्टर इशू) किया गया है | ये ईस्ट इंडिया कम्पनी जब आई है तो २०-२० साल के (चार्टर) इशू किये जा रहे हैं, पहला (चार्टर) १६०१ में मिला है, फिर दूसरा (charter चार्टर) १६२१ में मिलता है, फिर इस तरह से २०-२० साल के (चार्टर) दिए जाते हैं, चार्टर माने अधिकार पत्र | १८१३ की ये (debate डिबेट) जब (conclude कांक्लुड़) हो गई है तो ईस्ट इंडिया कंपनी को एक (स्पेशल चार्टर इशू) किया गया है हाउस ऑफ कॉमन्स की तरफ से और उस (चार्टर) का नाम है " चार्टर फॉर फ्री ट्रेड" | और में जोर दे रहा हूँ इस "फ्री ट्रेड" शब्द पर की ये जो "फ्री ट्रेड" शब्द है ये कोई नया नहीं है ये २५०-३०० साल पुराना शब्द है | आज जो कुछ अखबारों में पढ़ते हैं सुनते हैं की इस देश में (liberalisation लिबेरलिसतिओन) हो रहा है, (Globalisation ग्लोबलिसतिओन) हो रहा है, किसलिए हो रहा है | "फ्री ट्रेड" के लिए हो रहा है तो ये "फ्री ट्रेड" तो इस देश में अंग्रेजों ने भी चलाया और अंग्रेज इस देश में "फ्री ट्रेड" क्यूँ चला रहे हैं | भारतीय अर्थव्यवस्था को बर्बाद करना है और (ब्रिटिश इकोनोमिक सिस्टम) को इस देश में स्थापित करना है इसके लिए वो "फ्री ट्रेड" चला रहे हैं | तो उस फ्री ट्रेड में पालिसी क्या बन रही है जो सबसे पहली पालिसी बनी है कंपनी सरकार की, १८१३ में इस देश में कंपनी की सरकार है, ब्रिटेन की सरकार नहीं है | ब्रिटेन की सरकार आई है १८५८ के बाद, रानी की सरकार सीधे १८५८ के बाद आई है, उसके पहले कंपनी की सरकार है | माने ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार है तो ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार "फ्री ट्रेड" के लिए सबसे पहले पालिसी क्या बना रही है | वो ये है की हिन्दुस्तान में ब्रिटिश माल पर कोई (टैक्स) नहीं लगेगा और उसके बदले में जो हिन्दुस्तानी माल होगा उस पर ज्यादा से ज्यादा टैक्स लगाया जाए | नतीजा क्या निकलेगा अगर ब्रिटिश माल इस देश में (टैक्स फ्री) हो जायेगा तो गाँव – गाँव में ब्रिटिश माल सस्ता होगा और हिन्दुस्तानी माल पर लगातार (टैक्स ) बढ़ा दिया जायेगा तो हिन्दुस्तानी माल महंगा हो जायेगा | स्वदेशी माल महंगा हो जायेगा और विदेशी माल सस्ता हो जायेगा इसके लिए (पालिसी) बनाई है कंपनी सरकार ने जिसको कहा गया है "चार्टर फॉर फ्री ट्रेड" | उसके तहत अँगरेज़ इस देश में कुछ क़ानून बना रहे हैं | क़ानून क्या बना रहे हैं ? ब्रिटेन के माल पर तो (टैक्स) हटा दिया पूरी तरह से और कोई (इम्पोर्ट ड्यूटी) नहीं लगेगी ब्रिटेन के माल पर और हिन्दुस्तानी माल पर सबसे पहला टैक्स लगाया गया " सेंट्रल एक्साइज एंड साल्ट टैक्स " | और ये अंग्रेजों ने क्यूँ लगाया है " सेंट्रल एक्साइज टैक्स " ताकि हिन्दुस्तान में माल बनाने वाले लोगों का माल महंगा हो जाए | तो "सेंट्रल एक्साइज टैक्स" लगा दिया माने जो वस्तुएं बन रही हैं उस पर "उत्पाद कर" यानी उत्पादन पर कर | उसके बाद हिन्दुस्तानी व्यापारी उन वस्तुओं को बाज़ार में बेच रहे हैं तो कंपनी सरकार ने वस्तुओं के बाज़ार में बेचने पर भी कर लगाया है जिसको उन्होंने कहा है "सेल्स टैक्स" | फिर तीसरा कर लगाया है की उन वस्तुओं के बिकने पर जो आमदनी आये उस पर भी टैक्स | उसका नाम रखा "इनकम टैक्स" | तो उत्पादन पर "सेंट्रल एक्साइज टैक्स", बिक्री पर "सेल्स टैक्स", बिक्री से होने वाली आमदनी पर "इनकम टैक्स" | उसके बाद वस्तुओं का आवागमन जो है, यातायात जो है उसपर अंग्रेजों ने एक टैक्स लगाया है | जिसका नाम है "ओक्ट्रॉय टैक्स", चुंगी नाका | उसके बाद एक आखिरी टैक्स और लगाया अंग्रेजों ने | कंपनी सरकार क्या करती कहीं-कहीं पुल बनती थी तो पुल पर से जब ट्रक माल लेकर गुजर रहा है तो आप को पुल का कर देना है क्यूंकि हमारी बनायीं हुई सड़क आप उपयोग कर रहे हैं | तो उसको उन्होंने नाम दिया "टोल टैक्स" | तो ये ५ टैक्स लगा दिए अंग्रेजों ने देश के उद्योगपतियों पर ताकि उद्योगपतियों का नाश किया जाए और इसके बदले में जितना भी ब्रिटेन से माल आ रहा है इस देश में उसपर से सारे टैक्स हटा लिए गए हैं | क्यूंकि ब्रिटेन का माल उनको इस देश में बेचना है | नतीजे क्या निकलते हैं जब ये पाँचों के पाँचों टैक्स लग जाते हैं तो हर १०० रुपए के व्यापार पर १२७ रुपए का टैक्स | और इस बात की गंभीरता को समझिये की हर १०० रुपए के व्यापार पर १२७ रूपए का टैक्स है | तो एक दिन हाउस ऑफ कॉमन्स में (डिबेट) चल रही है तो एक सांसद कह रहा है की हिन्दुस्तान के व्यापारियों पर इतना टैक्स लगा दिया है की वो सब मर जायेंगे | तो दूसरा सांसद जवाब दे रहा है की यही हमें करना है | एक दूसरा सांसद खड़ा हो जाता है वो कहता है दोनों हाथ में लड्डू हैं हमारे या तो हिन्दुस्तानी व्यापारी मर जायेंगे मने १०० रूपए पर १२७ रूपए टैक्स देना पड़ जाए तो या तो वो आदमी मर जायेगा और या वो बेईमान हो जायेगा | और अगर वो बेईमान हो जायेगा तो भी हमारी गुलामी में आ जायेगा, और बर्बाद हो जायेगा तो हमारी गुलामी में आने ही वाला है | अब आप ध्यान करिए इन दो बातों को की इस देश में टैक्स प्रणाली क्यूँ लाई जा रही है ताकि हिन्दुस्तान के व्यापारियों को, पूंजीपतियों को, काम करने वालोँ को, उत्पादकों को बेईमान बनाया जाए या फिर उनको खलास किया जाए | इमानदारी से काम करें तो खलास हो जायें और बेईमानी से काम करें तो टैक्स की चोरी करें | और टैक्स की चोरी करें तो ब्रिटिश सरकार के अधीन रहें क्यूंकि चोरी करने वाला आदमी आँख में आँख डालकर बात नहीं कर सकता और इसके लिए फिर उन्होंने विभाग बना दिए | "इनकम टैक्स" विभाग, "सेंट्रल एक्साइज टैक्स" विभाग, "टोल टैक्स" वाला विभाग, "सेल्स टैक्स" विभाग, "ओक्टरॉय टैक्स" विभाग और आप को मैं बताऊँ की ये पाँचों के पाँचों विभाग आज आजादी के ५० सालों में भी चल रहे हैं | अंग्रेजों ने इन विभागों को बनाया था हिन्दुस्तान के व्यापारियों को ख़त्म करने के लिए तो मुझे लगता था की जब १५ अगस्त १९४७ को इस देश में आजादी आई तो अंग्रेजों द्वारा बनाये गए ये पाँचों विभाग कर देने चाहिए थे लेकिन वो आज भी चल रहे हैं | और उसी दौर की एक और जानकारी दूँ अंग्रेजों ने सबसे पहले जब "इनकम टैक्स" लगाया तो उसकी दर क्या है, कितना "इनकम टैक्स" देना पड़ता है | तो जो अंग्रेजों का सबसे पहला इनकम टैक्स की दर है वो ९७ प्रतिशत की है | मने १०० रूपए की कमी है तो ९७ रूपए आपको देना पड़ेगा | मने सिर्फ ३ रूपए आप को मिलेगा और आपको शायद ये मालूम होगा की आजादी के २०-२५ साल तक "इनकम टैक्स" ९७ प्रतिशत चलता रहा है | आजादी के बाद १९७०-१९७२ तक ९७% ही "इनकम टैक्स" लगता रहा इस देश में जबकि आजादी आ गयी थी १९४७ में तो मेरा सबसे पहला और गंभीर प्रश्न ये है की जो कर-प्रणाली का (स्ट्रक्चर) अंग्रेजों ने बनाया वही कर-प्रणाली का "स्ट्रक्चर" इस समय देश में चल रहा है | अंग्रेजों ने क्यूँ बनाया हिन्दुस्तानी व्यापारियों को बर्बाद करने के लिए और हिन्दुस्तानी व्यापारी बर्बाद हुए | १८३५, १८४० में इस देश की क्या स्थिति है व्यापार के क्षेत्र में उसका एक आंकडा है और ये आंकड़ा ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स की एक (डिबेट) से मिला | हाउस ऑफ कॉमन्स की एक (डिबेट) चल रही है तो एक सांसद कह रहा है की हिन्दुस्तान का व्यापार है कितना पूरी दुनिया में तो एक सर्वे किया है और वो सर्वे किया है यहाँ के (रेवेनुए ऑफिसर्स) ने जो ब्रिटेन की सरकार के जो भारत में कार्यरत हैं | उनका एक प्रमुख है विलियम एडम |
तो वो हिन्दुस्तान के कई (रेवेनुए ऑफिसर्स) को इस सर्वे में लगाता है की भारत का पूरा व्यापार कितना है | तो उसका आंकड़ा है १८५० तक हमारा पूरा व्यापार सारी दुनिया के व्यापार का एक तिहाई है | माने पूरी दुनिया में उस जमाने में १०० बिलियन डॉलर का व्यापार चल रहा हो तो ३३ बिलियन डॉलर का व्यापार अकेले हिन्दुस्तान का है | इसको एक दुसरे तरीके से भी कह सकते हैं की आज से १५० साल पहले इस देश का कुल व्यापार सारे दुनिया के व्यापार का ३३ टका है और इस बात को एक तीसरे तरीके से ऐसे भी कहा जा सकता है की १८५० के आस पास तक दुनिया में जो पूरा एक्सपोर्ट हो रहा है, एक्सपोर्ट में हिन्दुस्तान का प्रतिशत ३३ प्रतिशत है और आज आजादी के ५० साल के बाद हिन्दुस्तान का हिस्सा पूरे विश्व बाजार में .०१ प्रतिशत | हम जब गुलाम हैं अंग्रेजों के और अंग्रेज इस देश का सत्यानाश करने पर तुले हुए हैं और १५० साल पहले की ये बातें है तब इस देश में कोई उच्च तकनीकी नहीं है तथाकथित उच्च तकनीकी माने उच्च तकनीकी तो है पर तथाकथित नहीं | कोई (मेगा स्ट्रक्चर) नहीं है तब हमारे देश का एक्सपोर्ट ३३% है और आज इस देश में लाखों-लाख के निवेश के बाद, २४४ राष्ट्रीय (सेक्टर) होने के बाद इतनी विदेशी कंपनियों को बुलाने के बाद, हिन्दुस्तान में इतने बड़े-बड़े घराने होने के बाद, इतनी उच्च तकनीकी लेने के बाद व्यापार कितना है .०१% | तो हम तरक्की की तरफ बढ़ रहे हैं या विनाश की तरफ बढ़ रहे हैं | कहा ये जा रहा है की आप बहुत तरक्की कर रहे हैं | तो मैं मानता की तरक्की होती अगर ३३% वाला व्यापार हमारा ५०% हो गया होता, ७०% हो गया होता तो मैं मानता की हिन्दुस्तान ने तरक्की कर ली है | लेकिन ये तो घट कर .०१% पर आ गई | तो हम तरक्की कर रहे हैं या पीछे की तरफ जा रहे हैं | और एक बात विलियम एडम ने जो सर्वे कराया है उस सर्वे में कुछ ऐसे आश्चर्यजनक तथ्य हैं जो आप को पता चलेंगे तो आप चकरा जायेंगे | विलियम एडम अपनी रिपोर्ट में लिख रहा है १८३५, १८४० के आस पास हिन्दुस्तान में स्टील बनाने वाली १०,००० फैक्ट्री हैं आज से १५० साल पहले | और जो १०,००० फैक्ट्री हैं उनमे जो स्टील बनता है १८५० के आस पास वो स्टील इस क्वालिटी का है आप उसको वर्षों-वर्षों पानी में पड़ा रहने दीजिये उसमे जंग नहीं लग सकता | वो महरोली का खम्बा सालों से खड़ा है उसपर १% कहीं जंग नहीं है और आज आधुनिक तकनीकी से बनने वाले किसी भी स्टील को आप अपने आँगन में फ़ेंक दीजिये, तीन महीने उसको बारिश में पड़ा रहने दीजिये, उसपर जंग लग जायेगा | १५० साल पहले स्टील बन रहा है इस देश में उसपर १ प्रतिशत का जंग नहीं लगता, वर्षों वर्षों तक ऐसे ही है, और १०,००० फैक्ट्रीयाँ स्टील बना रही हैं | और स्टील का कुल उत्पादन कितना हैं ये सुनेंगे तो और आश्चर्य करेंगे | कुल उत्पादन है स्टील का हिन्दुस्तान में १८५० का करीब ८० से ९० लाख टन एक साल का | और आज जानते हैं कितना स्टील उत्पादन है इस देश में मुश्किल से ७० से ७५ लाख टन | इतना बड़े (प्रोजेक्ट) हैं, इतने बड़े बड़े निवेश हैं, इतने बड़े – बड़े सफ़ेद हाथी हमने खड़े किये हुए हैं तब स्टील उत्पादन है ७० लाख टन के आस पास | और हिन्दुस्तान १८५० में स्टील निर्यातक देश रहा है | ये दस्तावेज़ ब्रिटेन की संसद के हैं जब एक सांसद कह रहा है की ईस्ट इंडिया कंपनी के जितने जहाज बनाये गए हैं सब हिन्दुस्तान के स्टील को आयात करके बनाये गए हैं | और उस जमाने में १८५० के आस पास सबसे बढ़िया जो स्टील बनता है वो हिन्दुस्तान में बनता है या फिर एक दूसरा देश है डेनमार्क में बनता हैं तो डेनिश स्टील जो माना जाता है वो भारतीय स्टील से हल्का है और भारतीय स्टील डेनिश स्टील से बढ़िया है | और १०,००० स्टील बनाने के कारखाने हैं और इतने बड़े स्टील के उत्पादन का तंत्र है तो जरूर कोई ना कोई उच्च तकनीकी रही होगी इस देश में | ये अलग बात है की हम उसको जानते नहीं क्यूंकि अंग्रेजों ने वो दस्तावेज़ नष्ट कर दिए | और उन्हीं अंग्रेजों के दस्तावेजों के कुछ दुसरे हिस्से हैं जिनके आधार पर पता चला है की हिन्दुस्तान में सबसे ज्यादा स्टील उत्पादन होता था १८५० के आस-पास सरगुजा, मध्यप्रदेश में | इस पूरे सरगुजा में स्टील बनाने के कारखाने रहे हैं और सरगुजा में स्टील बनाने के कारखाने क्यूँ रहे | तो ये बात सब जानते है की सरगुजा में लोह अयस्क बहुत ज्यादा है | इसलिए उस ज़माने में स्टील बनाने के कारखाने हैं वहां पर | और स्टील बनाने का काम कौन करते हैं वहां, तो जिनको आप आदिवासी कहते हैं वो उस जमाने के स्टील उत्पादक लोग हैं | जिनको हम मानते हैं की ये लोग तो पढ़े लिखे नहीं हैं क्यूंकि इनके पास डिग्री नहीं है | क्यूंकि इन्होने बी-टेक नहीं किया , ऍम- टेक नहीं किया, पी एच डी नहीं किया | जबकि सच्चाई यह है की हिन्दुस्तान के सबसे बड़े स्टील उत्पादक हैं वो | और अभी भी सरगुजा में मैंने अपनी आँखों से देखा है, आजादी के ५० साल भी कुछ लोग बचे हैं जो स्टील बनाने की तकनीकी जानते हैं | लेकिन दुर्भाग्य ये है की वो तकनीकी आगे तक पहुँच नहीं रही है | वो तकनीकी ख़त्म कैसे हुई? अंग्रेजों ने हिन्दुस्तान के स्टील बनाने वाले कारखाने बंद कराए | पहले जो स्टील बनाने वाले आदिवासी होते थे वो जंगलों में से जो खदानें होती थी उन में से स्टील का कच्चा माल ले आते थे और स्टील बनाते थे उससे | अंग्रेजों ने एक कानून बना दिया की कोई भी आदिवासी खदानों में से कच्चा माल नहीं निकाल सकता | और इसको सख्ती से लागू भी करा दिया, फिर उन्होंने घोषणा कर दी की खदानों में से कोई आदिवासी अगर कच्चा माल निकलेगा तो उसको ४० कोड़े मारने की सज़ा | और उससे भी वो ना मरे तो उसको गोली मार दी जाए | इतना सख्ती से वो क़ानून लागू हो गया तो धीरे-धीरे आदिवासियों के स्टील के कच्चे माल पर पाबंदी लगा दी गयी और धीरे-धीरे वो ख़त्म होते चले गए | और क्रम के काल में वो करीब–करीब समाप्त हो गए | और आप को जानकर ये आश्चर्य होगा की ये जो क़ानून अंग्रेजों ने चलाया की आदिवासी लोह अयस्क नहीं ले सकते वो आज भी चल रहा है | आज भी वो लोग जो तकनीकी जानते हैं वो लोह अयस्क नहीं ले पाते और उसके दूसरी तरफ क्या चल रहा है? की बड़ी-बड़ी विदेशी कम्पनियां उस लोह अयस्क को खोद-खोद कर ले जा रही है | जापान की एक कंपनी है "निप्पन डेरनो" वो इसी धंधे में लगी हुई है | तो जापान की कंपनी को तो हिन्दुस्तान की खदानें खोद कर ले जाने की खुली छूट है लेकिन हिन्दुस्तान का कोई आदिवासी उन खदानों से लोह अयस्क लाकर स्टील बनाये तो उस पर पाबन्दी लगी हुई है | वो कच्चा माल नहीं ले सकता और ये मैं मान सकता हूँ की ये क़ानून अंग्रेजों ने बनाया, अंग्रेजों की सरकार थी, उनके अपने स्वार्थ थे, उनको ये देश बर्बाद करना था | मैं ये कैसे मान लूँ की आजादी के ५० साल बाद भी वही क़ानून चल रहा है, आज तो हमारी सरकार है, आज तो हमारे लोग हैं जो संसद में बैठे हैं, अब तो हम ये मानते हैं की ये देश अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हो गया है | तो फिर वोही क़ानून जो अंग्रेजों ने चलाया इस देश को बर्बाद करने के लिए वो क्यूँ चल रहा है? और क्यूँ नहीं कोई राजनीतिक पार्टी इस बात पर सोचती ? की विदेशी कंपनी तो कच्चा माल खोद-खोद कर ले जा रही है, जापान की कंपनी "निप्पन डेरनो" जो कच्चा माल ले जाती है वो कोडी के दाम पर जाता है और उससे स्टील बनाकर वापस इसी देश में लाकर बेचती है और फिर दूसरी बार भी मुनाफा ले कर जाती है | ये धंधा तो अंग्रेजों के जमाने में चलता था वो तो आज भी चल रहा है | कैसे मैं मानू की ये देश आजाद हो गया है | और इस तरह से अंग्रेजों ने क्या किया है की इस देश के तमाम हुनरमंद लोगों को बर्बाद कर दिया | स्टील बनाने वालों को को तो ऐसे बर्बाद किया अंग्रेजों ने और एक दूसरा किस्सा है | हिन्दुस्तान में बहुत बढ़िया और बेशकीमती कपडा बनाने वाले कारीगर होते थे और उन कारीगरों के हाथ का बनाया हुआ कपडा सारा देश जानता है की एक छोटी से अंगूठी में से सारा थान पार निकलता था | ढाका की मलमल इस देश में बनती थी, ढाका उस जमाने में इस देश का हिस्सा था बांग्लादेश तो १९७२ में बना है | उससे पहले वो पाकिस्तान का हिस्सा था और १९४७ से पहले हमारे देश का हिस्सा था | और ये किस्सा में बता रहा हूँ १७५० से १८५० के बीच का | इतना बेहतरीन कपडा बनाने वाले जो कारीगर होते थे उनके हाथ का बुना हुआ कपडा कोई कल्पना नहीं कर सकता की कोई मशीन इतना महीन कपडा बना सकती है क्या, इस हुनर से वो कपडा बनाते थे | और सारी दुनिया में वो हिन्दुस्तान का कपडा मशहूर था | सबसे ज्यादा निर्यात से मुनाफा दो ही चीज़ों से होती थी, एक तो हमारे मसाले बिकते थे या हमारा कपडा बिकता था | तो कपडा बनाने वाले जो कारीगर थे अंग्रेजों को उनसे परेशानी थी | अंग्रेजों को क्या परेशानी थी, लंकाशायर और मानचेस्टर का कपड़ा इस देश में बिक नहीं पाता था, क्यूंकि हिन्दुस्तानी कपड़ा ही इतनी उच्च गुणवत्ता का बनता था की कोई खरीदता ही नहीं था मानचेस्टर और लंकाशायर के कपडे को | तो अंग्रेजों ने क्या किया "फ्री ट्रेड" के नाम पर हिन्दुस्तान के बेहतरीन कपड़ा बनाने वाले कारीगरों के अंगूठे काटे ।
deepak raj mirdha
yog teacher , Acupressure therapist and blogger
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