सिक्ख गुरु और ब्राह्मण

हमारे बहुत से सिक्ख मित्र अकारण ही आवेश में आकर ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद जैसे शब्दों का यदा कदा प्रयोग करते हैं। वे इन शब्दों के लिये निंदायुक्त बातें भी कहते हैं । इसका मुख्य कारण मध्यकाल में आयी विकृति है। कुछ पाखंडियों ने अवैदिक कार्य कर करके ब्राह्मण शब्द की गरिमा को भयंकर ठेस पहुँचाई है । जिस कारण ब्राह्मण शब्द बदनाम हुआ। इन्हीं पाखंडियों ने अपने अधार्मिक कृत्यों को धर्म की चादर पहनाकर श्राध, तर्पण, देवदासी प्रथा, सती प्रथा, छुआछूत, जातिवाद, पशु बली, लम्पटता आदि धार्मिक भ्रष्टाचार से समाज का अहित किया।
अनेक सिक्ख विचारक भी ब्राह्मणों की निंदा और प्रत्येक वैदिक परम्परा को उसी ब्राह्मणवाद से जोड़ते हैं । वास्ताविक सत्य वे या तो नकारते है, या सुनकर भी उसे स्वीकार नहीं करना चाहते । परन्तु गुरुबाणी का अध्ययन करने पर हमें पता लगता है कि सिक्ख गुरू ब्राह्मणों की सत्य परिभाषा के प्रति जागरूक थे । और उन्होंने अपने उपदेशों में सत्य बताने का यत्न भी किया । उन्हीं गुरुबाणी के कुछ प्रमाणों से हम ब्राह्मण शब्द के बारे में फैली भ्रांतियों का निराकरण करने का यत्न करेंगे :-
ਸੋ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਜੋ ਬ੍ਰਹਮ ਵਿਚਾਰੈ । ਆਪ ਤਰੈ ਸਗਲ ਕੁਲਤਾਰੈ ।।
( ਧਨਾਸਰੀ ਮਹੱਲਾ ੧ ਸ਼ਬਦ ੭ )
ब्राह्मण वही जो ब्रह्म ( ईश्वर ) का विचार करता है । स्वयं तरता है और पूरे कुल को तार लेता है ।
ਮਨ ਕੀ ਪਤੱਰੀ ਵਾਚਈ ਸੁਖੀ ਹੂੰ ਸੁੱਖ ਸਾਗਰ ।
ਸੋ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਭਲ ਆਖੀਐ ਜੇ ਬੁਝੇ ਬ੍ਰਹਮ ਵਿਚਾਰ ।
ਹਰਿ ਸਾਲਾਹੇ ਹਰਿ ਪੜੈ ਗੁਰੂ ਕੇ ਸ਼ਬਦ ਵਿਚਾਰ ।
ਆਇਆ ਓਹ ਪਰਵਾਣ ਹੈ ਜਿ ਕੁਲ ਕਾ ਕਰੇ ਉਧਾਰ ।
ਅਗੈ ਜਾਤਿ ਨਾ ਪੂਛੀਐ ਕਰਣੀ ਸਵਦ ਹੈ ਸਾਰ ।
( ਮਾਰੂ ਵਾਰ ਮਹਲਾ ੩ ਵਾਰ ੨੨ )
मन के द्वार खोलकर देखें तो मन में अपार सुख लिए वही ब्राह्मण जो ब्रह्म विचार में लीन रहता है । ईश्वरेच्छा से ही वो गुरु के शब्द बार बार विचारता है और अपने कुल का उद्धार करता है । ऐसे ब्रह्मवित् की जाती नहीं पूछनी चाहिए । इसका यही सार निकलता है ।
ਸੋ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਜੋ ਵਿੰਦੇ ਬ੍ਰਹਮ । ਜਪ ਤਪ ਸੰਜਮ ਕਮਾਵੈ ਕਰਮ ।।
ਸੀਲ ਸੰਤੋਸ਼ ਕਾ ਰਖੇ ਧਰਮੁ । ਬੰਦਨ ਤੋੜੇ ਹੋਵੇ ਮੁਕਤਿ ।।
ਸੋਈ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਪੂਜਨ ਜੁਗਤਿ । ਸਲੋਕ ਵਾਰਾਂ ਤੇ ਵਧੀਕ ।।
( ਰਾਗ ਵਿਲਾਵਲਾ ਵਾਰ ਮਹਲਾ ੪ ਸਲੋਕ ਮਹਲਾ ੨ ਵਾਰ ੩ ਸਲੋਕ ੧੬ )
वही ब्राह्मण है जो ब्रह्म को विचारता है , जप तर के द्वारा कर्म करता है । शीलता और संतोष को धारण करता है । बंधन तोड़कर मुक्त होता है । वही ब्राह्मण जग में पूजनीय है ।
अब हम कुछ प्रमाण वैदिक मनुस्मृति से देते हैं :-
अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा ।
दानं प्रतिग्रहं चैव ब्राह्मणानामकल्
पयत् ।।
( मनुस्मृति १/८८ )
पढ़ना पढ़ाना, यज्ञ करना कराना, दान देना लेना, ब्राह्मण के कर्म हैं ।
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ।।
( मनुस्मृति १८/४२ )
शम, दम, तप, शौच, शान्ति, आर्जव, ज्ञान, विज्ञान, आस्तिकता ये सब ब्राह्मण के गुण कर्म हैं ।
जैसा कि ऊपर लिखे प्रमाणों से ब्राह्मणों के कर्म सिद्ध हैं वैसे ही सबको मानने चाहिएँ । मात्र चोटी रखकर, माथे पर टीका लगाकर, और मंदिरों में बैठकर घंटी बजाने से कोई ब्राह्मण नहीं होता । ब्राह्मण तो तपस्वी व्यक्ति को मानना चाहिए । जैसा कि सिक्ख गुरु भी मानते थे ।
गुरु नानक के जीवन का एक उदहारण हमें बहुत प्रेरणा देने वाला है। एक बार गुरु नानक हरिद्वार गए। गुरु जी ने हरिद्वार पहुंचकर देखा कि लोग स्नान करते हुए नवोदित सूर्य की ओर पानी हाथों से अर्पित कर रहे है तो आप ने पश्चिम की ओर मुंह करके दोनों हाथों से पानी अर्पित करना शुरू कर दिया| ऐसा देखकर ब्राह्मणों ने पूछा आप पश्चिम की और पानी क्यों अर्पित कर रहे हो? गुरु जी ने उनसे ही पूछ लिया कि आप पूर्व दिशा की ओर क्यों कर रहे हो? उन्होंने ने उत्तर दिया हम तो सूर्य को पानी दे रहे हैं|
गुरु जी ने भी हंस कर कहा कि हम भी अपने खेतों को पानी दे रहे हैं| ब्राह्मणों ने कहा आपकी खेती जो बहुत दूर तीन सौ कोस है वहां पानी कैसे पहुंचेगा? गुरु जी ने उत्तर दिया अगर करोड़ों कोसो दूर आपका पानी सूर्य तक पहुंच सकता है तो तीन सौ कोस दूर हमारे खेत में क्यों नहीं पहुंच सकता| ब्राह्मण उनकी ये बात सुनकर चुप हो गए|
इसी प्रकार से गुरु साहिबान न केवल ब्राह्मण के कर्तव्यों को भली भांति जानते थे अपितु जो ब्राह्मण नाम रखकर अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं करता था। उसे सत्यमार्ग का उपदेश भी करते थे।
deepak raj mirdha
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