आखिर बाबा साहब अम्बेडकर ने संविधान जलाने की बात क्यों की।एक सच्चाई।।आप जरूर पढ़ें।।


डा. अम्बेडकर भारत के संविधन रचयिता हैं। डा. अम्बेडकर संविधन-निर्माण प्रारूप समिति के अèयक्ष थे और उन्हीं के शब्दों में "किसी देश का संविधन एक मूल दस्तावेज होता है। जिसमें राज्य के तीनों अंगों कार्यपालिका, न्यायपालिका तथा विधयिका की स्पष्ट रूप से शकितयों एवं अधिकारों का उल्लेख रहता है। कितने विद्वान, लेखक तथा राजनेता पुर्वाग्रह से ग्रसित होकर यहां तक कह डालते हैं कि डा. अम्बेडकर ने संविधन का निमार्ण नहीं किया और दलित वोट बैंक के चलते बढ़ा-चढ़ाकर डा. अम्बेडकर को सरकार भी प्रतिष्ठा देती है। जबकि असलियत यह है कि डा. अम्बेडकर संविधन निर्माण प्रारूप समिति के अèयक्ष थे। भारत में 1946 में आन्तरिम सरकार का गठन हुआ। दिल्ली में 'संविधन निर्मात्राी परिषद का गठन हुआ।
उन्हीं दिनों की घटना है कि एक दिन श्री जवाहर लाल नेहरू और श्रीमती सरोजनी नायडू, गांध्ी जी से मिलने गये पंडित नेहरू कुछ सुस्त थे गांध्ी जी ने उनका चेहरा देखकर सुस्ती का कारण पूछा तो नेहरू ने बताया कि भारत के संविधन के निर्माण के लिए एक संविधन शास्त्राी की आवश्यकता है। एशियार्इ देशों के संविधन निर्माता श्री आयुस जेनिस को बुलाने की बात सोची जा रही है। तभी गांध्ी ने कहा कि अपने देश के महान संविधन विशेषज्ञ डा. भीम राव अम्बेडकर को क्यों भूल रहे हो? और इस प्रकार डा. अम्बेडकर को कांग्रेस दल ने अपने दल की हैसियत से संविधन परिषद में नामजद किया और वे संविधन निर्माण प्रारूप समिति के अèयक्ष हुये। वैसे अन्य सदस्यों में श्री एन. गोपाल स्वामी, अयंगर सर अल्लादी, कृष्णास्वामी अययर, के.एम. मुन्शी, ख्सर भो, एन माध्व मेनन, डी.पी. खेतान तथा बी.एन. राव संवैधनिक सलाहकारों ने भी मदद किया। पिफर भी डा. अम्बेडकर संविधन निमार्ण में स्वतंत्रा नहीं थे। उन पर नेहरू और पटेल का भारी दबाव था, कुछ कानूनों के डा. अम्बेडकर खिलापफ थे पिफर भी उन्हें मानना पड़ा। यह एक बहुत महत्वपूर्ण तथ्य है। कि संविधन निर्माण की प्रक्रिया डा. अम्बेडकर के विधि मंत्राी बनने के पहले शुरू की चुकी थी। संविधन के भिन्न-भिन्न विषयों पर अलग-अलग कमेटियां पहले ही गठित कर ली गयी थी। मौलिक अधिकारों पर जो कमेटी गठित की गयी थी। उसके अèयक्ष तत्कालीन प्रधन मंत्राी जवाहर लाल नेहरू थे। इस कमेटी में डा. अम्बेडकर को सदस्य भी नहीं बनाया गया था। डा. अम्बेडकर ने नेहरू को एक पत्रा लिखकर यह कहना चाहा कि संविधन में राज्य को नीति निदेशक सि(ान्त दिये जाने न कि मौलिक अधिकार लेकिन डा. अम्बेडकर की एक न सुनी गयी और वही हुआ जो नेहरू और पटेल चाहते थे। इस तरह यह सरकारी संविधन 'समझौते का दस्तावेज है और पूना पैक्ट सवर्णों ने लिखा डा. अम्बेडकर से उस पर हस्ताक्षर कराया गया था लेकिन सरकारी संविधन दूसरा पूना पैक्ट है, जिसे डा. अम्बेडकर से लिखवाया गया और हस्ताक्षर उन्होंने कर दिया। इस प्रकार भारतीय संविधन समझौते का एक दस्तावेज भर है। यहां तक की स्वतंत्राता के बाद "महात्मा गांध्ी ने भी कहा था कि मेरी कहां चलती है कौन बात मानता है। इसीलिए डा. अम्बेडकर को सितम्बर 1953 में राज्य सभा में मजबूर होकर कहना पड़़ा कि अगर भारत के संविधन को जलाना पड़े तो जलाने वालों में मैं पहला आदमी बनूंगा।
deepak raj mirdha
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Reviewed by deepakrajsimple on October 21, 2017 Rating: 5

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